इस दुनिया में इतनी रुसवाई क्यूँ होती है
हमारी हमारे ही अहसास से जुदाई क्यूँ होती है
हमसे किसी का इंतज़ार नहीं हो पाता
कोई हमारा राह भी नहीं तक पाता
इस दर्द को हमदर्द से शिकायत ये होती है
सबसे ज्यादा करीब मेरी परछाई क्यूँ होती है
रात में ये परछाई भी साथ छोड़ जाती है
बाद इसके सिर्फ तन्हाई [...]
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अहसास से जुदाई क्यूँ होती है – प्रणव कुमार झा
मेरी अधूरी कविता – प्रणव कुमार झा
बेचैन हूँ अश्क में तैरती परछाइयों से
परेशान हूँ भीड़ में मौजूद तनहाइयों से
डर जाता हूँ रात के अँधेरे से
अकुला जाता हूँ दिन के उजाले से
खिन्न होता हूँ जिनसे बात नहीं कर पाने से
तंग होता हूँ उन्हीं के सपने में आने से
किंकर्त्तव्यविमूढ़ हूँ, क्या करुँ, कहाँ जाऊं
जो अहसास खुद में ही डूबा हुआ हो
उसे और कहाँ [...]
गणतंत्र – कवि का दॄष्टिकोण – प्रणव कुमार झा
First of all, I wish all the countrymen – Happy Republic day and with that I join in spreading the feelings of peace and prosperity to all the human being living on this globe. Let us co-exist in a happy world without hurting each other. Please read the following lines which is my expression of [...]
